एकरूपता, सामूहिकता और समरसता का त्योहार। कोरोना के दौर मे होली का त्योहार।
सन्तो,महापुरूषो जी धन निरंकार जी और जो धन निरंकार को नही जानते, उनको मेरा हाथ जोड़कर नमस्कार स्वीकार हो। आज हम बात करेंगे कि कैसे हमारी संस्कृति का खात्मा होता जा रहा है? भारत वर्ष की एकरूपता,सामूहिकता और समरसता के इस त्योहार पर कैसे समय की मार पड़ रही है? भाई-भाई का दुश्मन होता जा रहा है, पड़ोसी अब पड़ोसी से गले मिलने को तैयारी नही है। सभी धर्मो मे बटते जा रहे हैं। जहाँ पर सभी मिलजुलकर कर रगं खेलते थे, गले मिलते थे, एक-दूसरे के घर-घर जाकर बधाईयाँ देते थे, अब ऐसा नही रहा। सभी अपने-अपने काम को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। तो बात करे इस त्योहार की तो प्रकृति जब वसंत के मौसम मे हमे चारो ओर बिखरे रगं प्रदान करती है, उसी समय रंगो का यह त्योहार होली मनाया जाता है। इसी समय बुजुर्ग पेड़ो पर भी नई कोपले फूटती है, नन्हे पौधो मे रगं-बिरंगे फूल खिलते हैं, उनसे पराग ग्रहण करने के लिये तितलियाँ उन पर मंडराने लगती है। (Pic Sourse- Google) ऐसे मे जब होली का त्योहार आता है, तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति के उल्लास मे चार चाँद लग ...