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एकरूपता, सामूहिकता और समरसता का त्योहार। कोरोना के दौर मे होली का त्योहार।

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सन्तो,महापुरूषो जी धन निरंकार जी और जो धन निरंकार को नही जानते, उनको मेरा हाथ जोड़कर नमस्कार स्वीकार हो। आज हम बात करेंगे कि कैसे हमारी संस्कृति का खात्मा होता जा रहा है? भारत वर्ष की एकरूपता,सामूहिकता और समरसता के इस त्योहार पर कैसे समय की मार पड़ रही है? भाई-भाई का दुश्मन होता जा रहा है, पड़ोसी अब पड़ोसी से गले मिलने को तैयारी नही है। सभी धर्मो मे बटते जा रहे हैं। जहाँ पर सभी मिलजुलकर कर रगं खेलते थे, गले मिलते थे, एक-दूसरे के घर-घर जाकर बधाईयाँ देते थे, अब ऐसा नही रहा। सभी अपने-अपने काम को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। तो बात करे इस त्योहार की तो प्रकृति जब वसंत के मौसम मे हमे चारो ओर बिखरे रगं प्रदान करती है, उसी समय रंगो का यह त्योहार होली मनाया जाता है। इसी समय बुजुर्ग पेड़ो पर भी नई कोपले फूटती है, नन्हे पौधो मे रगं-बिरंगे फूल खिलते हैं, उनसे पराग ग्रहण करने के लिये तितलियाँ उन पर मंडराने लगती है।                 (Pic Sourse- Google) ऐसे मे जब होली का त्योहार आता है, तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति के उल्लास मे चार चाँद लग ...

होलिका दहन क्यो करते हैं ? रंगो का त्यौहार होली, क्यो मनाई जाती है ?

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सन्तो, महापुरूषो जी धन निरंकार जी और जो धन निरंकार को नही जानते, उनको मेरा हाथ जोड़कर नमस्कार स्वीकार हो। आज हम बात करेंगे कि होली का त्यौहार क्यो मनाया जाता है ? क्यो? एक भक्त की वजह से पूरे भारत वर्ष मे रगों का त्यौहार मनाया जाता है। ये सतयुग की कहानी है। इसकी पुष्टि श्रीमदभागवत गीता और पुराणों मे की जाती है। कहा जाता है कि झासी से लगभग 80 किमी दूरी पर स्थित ऐरच नगर है, जो सतयुग मे राजा हिरण्यकशिपु की राजधानी थी।                    (Pic Sourse- Google) माना जाता है कि हिरण्यकशिपु बहुत बड़ा राक्षस था। उसने अपने तप और त्याग से भगवान ब्रहमा जी को खुश कर लिया।                 (हिरण्यकशिपु ) Pic Sourse-Google ब्रहमा जी ने जब उनसे वरदान मांगने के लिये कहा तो हिरण्यकशिपु के मन मे अहंकार आ गया । उसने ब्रहमा जी से कहा कि मुझे ऐसा वरदान दो जिसमे मुझे ना इन्सान मार सके ना जानवर। ना अस्त्र ना शस्त्र। ना आग ना पानी। ना देवता ना राक्षस। कोई भी मुझको  मार ना पाये। ब्रहमा जी...

कलयुग का ऐसा भक्त जिसका नाम अमर सन्तो की लिस्ट मे आ गया। एक ऐसे सन्त जिनके नाम से निरंकारी सरोवर का नाम सन्तोख सरोवर पड़ गया। निरंकारी सरोवर के खुलने का समय ?

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सन्तो,महापुरूषो जी धन निरंकार जी और जो धन निरंकार को नही जानते हैं, उनको मेरा हाथ जोड़कर नमस्कार स्वीकार हो।                      (सतगुरु माता सुदिक्षा जी) आज हम बात करेंगे एक ऐसे सन्त के विषय मे जिनको कलयुग का हनुमान कहने मे कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिनके तप, त्याग और निस्वार्थ सेवा की बदौलत ही एक ऐसा अमरकुडं बनके तैयार हुआ जिसमे स्नान मात्र से हमारे सभी कष्ट दूर हो जातें हैं अर्थात एक डुबकी विश्वास और श्रद्धा की लगाने से ही शरीर के सभी रोग दूर हो जाते हैं।                            (सरोवर गेट) इस अमरकुडं की महानता के बारे मे पहले पढ चूकें है, जिन्होंने नही पढा है तो वो पहले उसको भी पढ ले। ऐसे महान सन्त का यश ये पूरा संसार गाता है। उनकी भी इस निरंकार की भाँति पूजा होती है, उनका भी लोग प्रभु का सच्चा भक्त मानकर यशोगान करते हैं। ऐसे सन्त भाग्य से मिलते हैं। जो निरंकार के बनाये हुऐ बन्दो से प्यार करता है उनकी झोली ये खुशियों से भर देता है। जो भी ...

क्यो सतगुरु की नौकरी अच्छी होती है? कौन करता है ये नौकरी?कितना आनन्द होता है सतगुरु अर्थात निरंकार प्रभु परमात्मा की नौकरी मे?

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सन्तो, महापुरूषो जी धन निरंकार जी, और जो धन निरंकार को नही जानते, उनको मेरा हाथ जोड़कर नमस्कार स्वीकार हो ।        सतगुरु माता सुदिक्षा जी।  ( Pic Sourse- Google) आज हम बात करेंगे कि सतगुरु (परमात्मा का साकार) की नौकरी (निस्वार्थ सेवा) मे कितना आनन्द होता है। निरंकार का नौकर खुद निरंकार होता है कैसे? सतगुरु की जो नौकरी करता है, उसके पास तीनो लोको के सारे सुख होते हैं। तीनो लोको मे उसका यश गाया जाता है। सूर्य, धरती, चन्द्रमा, ग्रह, तारे, पानी, वर्षा, बादल आकाश, अग्नि,धूप और ठंड इत्यादि अपना-अपना काम निस्वार्थ रूप से करते रहते है, ये सभी निरंकार की नौकरी करते रहते हैं। सभी अपने समय से सारा काम करते रहते हैं। जैसा ही निरंकार प्रभु परमात्मा का आदेश होता है,उस काम (सेवा) को अच्छे से निभाते चले जाते हैं। सभी को निरंकार ने अलग-अलग सेवा बक्सि है, और सभी निस्वार्थ रूप से अपनी सेवा को पूरा करते हैं। तो इस प्रकार सतगुरु का नौकर (सेवक) जो होता है वो परमानंद से भरा रहता है।  जो इसकी नौकरी करता है, वह निरंकार का बहुत खास होता है और वह उसे( नौकर...