कल हम कहा थे ? और आज हम कहा है?
धन निरंकार सन्तो जी।
ज्ञान लेने से पहले हम क्या थे, हमारी ओकात क्या थी, और आज हम क्या है। आज क्या हमारी ओकात हो गई है।
सतगुरु माता सुदिक्षा जी महाराज जी।
*कल हम शरीर बनकर संसार मे पशुओं की भाति विचरण कर रहे थे। आज हम ज्ञान से युक्त होकर आत्मा रूप मे सतगुरु चरण मे आत्म मुक्ति की बख्शीश पाने मे लगे हैं।
*कल हम प्रभु दर्शन के लिये दर दर की ठोकर खाकर असफल ही दोड़ लगा रहे थे,
आज हम प्रभु को अगं सगं जानकर जगह -जगह करके सेवा के लिये दोड़ मे लगे हैं। और मानव कल्याण की दोड़ मे लग पड़े हैं।
*कल हम शांति और संतोष की तलाश मे भटक रहे थें, आज हम शांति और संतोष की संभाल मे लगे हैं।
*कल हमे जब ग्यान नही था तो एक सीमित प्रभु की काल्पनिक दुनियाँ मे थे, आज हम अनन्त निरंकार सर्वव्यापी प्रभु की वास्तविक दुनिया मे जीते हैं।
तो इस प्रकार सन्तो महापुरूषो जी हमे जो ज्ञान रूपी अमोलक दात बक्शी है इस निरंकार प्रभु ने हम सदा उसका गुणगान करते चले जाये।
और दास को भी ऐसी सुमति देना कि जिससे हर पल इसका शुक्र करते चले जाये।
धन निरंकार जी।
धनयवाद।
ज्ञान लेने से पहले हम क्या थे, हमारी ओकात क्या थी, और आज हम क्या है। आज क्या हमारी ओकात हो गई है।
सतगुरु माता सुदिक्षा जी महाराज जी।
*कल हम शरीर बनकर संसार मे पशुओं की भाति विचरण कर रहे थे। आज हम ज्ञान से युक्त होकर आत्मा रूप मे सतगुरु चरण मे आत्म मुक्ति की बख्शीश पाने मे लगे हैं।
*कल हम प्रभु दर्शन के लिये दर दर की ठोकर खाकर असफल ही दोड़ लगा रहे थे,
आज हम प्रभु को अगं सगं जानकर जगह -जगह करके सेवा के लिये दोड़ मे लगे हैं। और मानव कल्याण की दोड़ मे लग पड़े हैं।
*कल हम शांति और संतोष की तलाश मे भटक रहे थें, आज हम शांति और संतोष की संभाल मे लगे हैं।
*कल हमे जब ग्यान नही था तो एक सीमित प्रभु की काल्पनिक दुनियाँ मे थे, आज हम अनन्त निरंकार सर्वव्यापी प्रभु की वास्तविक दुनिया मे जीते हैं।
तो इस प्रकार सन्तो महापुरूषो जी हमे जो ज्ञान रूपी अमोलक दात बक्शी है इस निरंकार प्रभु ने हम सदा उसका गुणगान करते चले जाये।
और दास को भी ऐसी सुमति देना कि जिससे हर पल इसका शुक्र करते चले जाये।
धन निरंकार जी।
धनयवाद।


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